Friday, February 1, 2013

कबायली क्षेत्रों में लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का विनाश


सुर्ख-रेखा प्रकाशन (फरवरी, 2013)


अत्याचारी राजसत्ता द्वारा कबायली क्षेत्रों में लोगों के
लोकतांत्रिक अधिकारों का विनाश
जनवादी संगठनों की जांच-पड़ताल टीम के एक सदस्य का अनुभव
          अक्तूबर 2012 के अंतिम सप्ताह, जनवादी अधिकारों के संगठनों की एक सांझी तथ्य खोज टीम झारखण्ड के पलामू और बिहार के औरंगाबद एवम् गया जिलों में अर्ध सैनिक बलों द्वारा लोगों पर बरपाए जा रहे जुल्मों के विवरण इकट्ठा करने के लिए वहां गई। जमहूरी अधिकार सभा पंजाब द्वारा मुझे इस टीम में शामिल होने का अवसर मिला। वहां लेखक एवम् जनवादी अधिकारों के कार्यकर्ता गौतम नवलक्खा के नेतृत्व में इस टीम में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड एवम् पंजाब जनवादी अधिकारों के संगठनों के प्रतिनिधि और कुछ पत्रकार शामिल थे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों और टूटी-फूटी सड़कों पर चल कर, गहरे नदी, नालों और घने जंगलों में से गुजरते हुए हम लगभग 12-13 गांवों और दो-तीन कस्बों में पीडि़त लोगों से मिले। झारखण्ड की पी.यू.सी.एल. इकाई द्वारा पीडि़त लोगों को तथ्य खोज कमेटी के आने के बारे में पहले से ही सुचित किया हुआ था, इसलिए यह टीम जहां भी रूकी, वहां भारी गिनती में लोग अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाने के लिए पहुंचे। बहुत सारे स्थानों पर 150-200 पीडि़त लोग इकट्ठे होते रहे। टीम ने पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों द्वारा लोगों पर किए अत्याचारों के दस्तावेज़ी सबूत जैसे, एफ.आई.आर. अखबारों की खबरें, पीडि़त लोगों द्वारा प्रशासकीय अधिकारियों को दी गई शिकायतें और उनके जवाब, अदालतों में दायर की गई शिकायतें, पुलिस की जांच, और जांच-पड़ताल रिपोर्टें, डाक्टरी रिपोर्टें एवम् बिहार राज महां दलित कमीशन की रिपोर्टें आदि एकत्रित कीं। टीम ने खुली सुनवाई द्वारा लोगों से तथ्य एकत्रित किए। बहुत सारे लोगों की शहादत, तस्वीरें और घटना-स्थलों के विवरण मोबाईल फोनों और कैमरों द्वारा रिकार्ड किए। हम उन परिवारों को मिले जिनके परिवारजन पुलिस और अर्ध सैनिक बलों ने झूठे मुकाबलों या थानों में बर्बरता से मार डाले थे। हमने माओवादी कार्यकर्ताओं के वह घर भी देखे, जो पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों की छत्रछाया में काम कर रहे गिरोहों, जैसे तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टी.पी.सी.) एवम् सशस्त्र पीपल्ज मोर्चा (एस.पी.एम.) द्वारा गिराए गए थे।
रौंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य
तीन दिन की छानबीन के बाद जो तथ्य सामने आए, वे अत्यंत भयानक थे। 'वामपंथी आतंकवाद को कुचलने के नाम पर जुल्म और बर्बरता का कहर बरपाया जा रहा है। उनके सभी संविधानिक एवम् कानूनी अधिकार कुचल दिए गए हैं। अर्ध सैनिक बल बे$खौफ हो कर लोगों के कत्ल करते हैं, उन्हें झूठे केसों में फँसाते हैं, बहन-बेटियों की इज्जतों से खेलते हैं, लोगों के लिए विद्या, स्वास्थ्य सस्ता राशन, रोजगार एवम् प्राकृतिक साधनों (जल, जंगल, जमीन) के इस्तेमाल जैसे अधिकार छीन लिए गए हैं। पुलिस के अत्याचार और राज्य की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को 'माओवादी होने का ठप्पा लगा कर कुचल दिया जाता है। इन तथ्यों से वहां की हालत की जो तस्वीर उभरती है, उसके कुछ महत्वपूर्ण पक्ष इस प्रकार हैं:
1. चाहे बिहार के जिन दो जिलों औरंगाबाद और गया में जहां हम गए, वहां सरकारी तौर पर ऑपरेशन ग्रीन हंट नहीं चल रहा, पर लोगों पर जुल्म की हालतें दिल दहलाने वाली हैं। अर्ध-सैनिक बल और पुलिस हमलावर सैनाओं की भांति व्यवहार कर रही हैं। लोगों पर दहशत डालने के लिए उन्हें कत्ल करना, हाथ-पांव तोड़ देना, झूठे केसों में फंसा कर जेलों में डाल देना, महिलाओं को बेइज्जत करना प्रत्येक को गाली देना और मारपीट करना आम बात है। लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों के जूतों-तले वहशी ढंग से कुचले जा रहे हैं।
2. लोगों की शिकायतें, दुख-तकलीफों की सुनवाई और निपटारा करने का कोई प्रबन्ध नहीं, सभी संवैधानिक एवम् कानूनी अधिकारों को एक तरफ रखकर पुलिस का पूरा जोर लाट्ठियों, गोलियों और जेलों पर है। सिविल प्रशासन पूरी तरह ठप्प है। कोई मंत्री या विधायक लोगों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ मूंह तक नहीं खोलता।
3. पुलिस लोगों की आम जनतक तथा राजनैतिक सरगर्मी विशेषकर ग्रमीण क्षेत्रों में, की भी इजाजत नहीं देती। किसी भी जनतक संगठन, यहां तक कि गैर-सरकारी और सामाजिक संस्थानों (एन.ओ.जी.) को भी काम नहीं करने दिया जाता। मिसाल के तौर पर गया जिले के सेवायिनक गांव के राज कुमार पुत्र छट्टू यादव का मामला सुनिए। वह बी.ए. तक पढ़ा है, साल 2001 में उसे बमेर गांव का मुखिया चुना गया। उसने 'मगध विकास भारती नाम की एक गैर-सरकारी संस्था में काम करना शुरू कर दिया। इस संस्था द्वारा वह नाबार्ड (NABARD) से मिले फंडों की सहायता से गांवों में श्रमदान (कारसेवा) द्वारा विकास के कार्य करवाता था। साल 2010 में बारा हट्टी थाने के मुख्य अधिकारी ने साल 2007 में रोहतास जिले के रायपुर थाने में दर्ज एफ.आई.आर. नं. 74/07 में उसे दहशतगर्दी के जुर्म में पकड़ कर जेल में डाल दिया। इसी तरह काहूडार्ग गांव का राम अशीरा यादव बोध गया का एक गैर-सरकारी संगठन 'जीवन संगम में साल 2006 से काम कर रहा था। यह संस्था गरीब लोगों को सरकार की समाज कल्याण योजनाएं जैसे मनरेगा (MANREGA), स्कूली विद्यार्थीयों एवम् विकलांगों के लिए पेन्शन, कन्या सुरक्षा आदि के फायदे लेने के लिए शिक्षित करती है। उसका गांव में एक छोटा-सा जमीन का प्लाट था, जिसे गांव का ही एक बदमाश बंधन यादव हथियाना चाहता था, उसने बाराहुट्टी थाना प्रमुख्य को इसके सम्बन्ध में एक आवेदन-पत्र लिखा। उधर बन्धन यादव ने सश पीपल्ज मोर्चा- जो माओवादियों के खिलाफ लडऩे के लिए पुलिस एवम् अर्ध-सैनिक बलों द्वारा संगठित हथियारबद्ध गिरोह है, के नेताओं से संपर्क कर लिया। उन्होंने पुलिस से मिल कर साल 2009 में दर्ज हुए एक केस में राम अशीस यादव को जेल में बन्द करवा दिया और बाद में उसके प्लटा पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया। पतलूका गांव का बब्बन यादव अपने बुजुर्ग मां-बाप का इकलौता पुत्र है और हजारी बाग की गैर-सरकारी संस्था 'जन सेवा परिषद् में साल 2008 से काम कर रहा है। यह संस्था भी गांवों में विकास के काम करवादी है। एक दिन जब वह संस्था के एक इंजीनियर के साथ एक गांव में हो रहे काम को चैक कर वापिस आ रहा था तो सी.आर.पी.एफ. के अधिकारियों ने उसको नक्सली बोल कर पकड़ लिया। उस दिन तो उसे देर रात छोड़ दिया पर कुछ दिन बाद 2010 में दर्ज हुए 2 केसों में उसे पकड़ लिया। इस तरह के कई अन्य केस तथ्य खोज टीम के पास आए।
4. पुलिस के जुल्मों एवम् बढ़ते अत्याचार का सब से ज्यादा प्रभाव समाज के गरीब वर्ग- महांदलित, कबायली लोग, देहाती एवम् शहरी गरीब, सीमांत किसान, खेत-मजदूर, दस्तकार और अपनी रोजी-रोटी के लिए जंगलों की पैदावार पर निर्भर लोगों पर पड़ रहा है। इस इलाके में कुछ सरकारी स्कूल एवम् अस्पताल अर्ध-सैनिक बलों के कब्जे में हैं, जहां उन्होंने अपने क्षेत्रीय मुख्यालय बनाए हुए हैं और सम्बन्धित क्षेत्र में सारी पुलिस कार्यवाईयां वहां से की जाती हैं। सन्दिग्ध व्चक्तियों से पुछताछ, यातनाएँ देकर वहीं पर की जाती हैं। बरहा गांव में एक ऐलीमैन्ट्री स्कूल है, जिसमें पहले 300 से ज्यादा बच्चे पढ़ते थे। सी.आर.पी. ने यहां अपना कैंप बना लिया। विद्यार्थीयों, अध्यापकों और गांव वासियों ने इसका विरोध किया और संघर्ष शुरू कर दिया। पुलिस ने इस संघर्ष को डंडे के जोर पर कुचल दिया। कुछ दिनों बाद माओवादियों ने इस स्कूल का एक हिस्सा बम्ब-धमाके से उड़ा दिया। इस घटना से डर कर सी.आर.पी. ने फौरन अपना कैम्प वहां से उठा लिया। असुरक्षा की इन घटनाओं द्वारा पैदा हुए माहौल की वजह से अब इस स्कूल में सिर्फ 45 विद्यार्थी और 2 अथ्यापक ही बाकी रह गए हैं। यह उर्दू माध्यम स्कूल है, परन्तु उर्दू पढ़ाने वाला कोई अध्यापक नहीं।
दूसरी तरफ गांव चाक-पहरी में वहां की क्रांतिकारी किसान कमेटी ने लोगों के सहयोग से कार-सेवा द्वारा एक स्कूल बनवाया था। पुलिस ने इसे माओवादी प्रोजेक्ट बताते हुए तहस-नहस कर दिया। गांव के जो कारकुन यह स्कूल बनाने में आगे थे, जैसे सुरिन्द्र भूईया, उसका बाप सोनू भूईया और भाई सुरिन्द्र भूईया को पुलिस ने पकड़ कर बुरी तरह पीटा और झूठे केसों में फंसा दिया, उनके घर जला दिए गए। गांव मे दो और लोगों के घर भी जलाए, महिलायों की मारपीट की गई। जनेवा कनवेन्शन तहित जंग के दौरान हथियारबद्ध सेनाओं द्वारा स्कूलों एवम् अस्पतालों को जंगी कार्यवाईयों के लिए इस्तेमाल करना मना है। परन्तु भारत के अर्ध-सैनिक बल इस नियम की तनिक भी परवाह नहीं करते।
6. इस क्षेत्र में 'वामपन्थी आतंकवाद से निपटने के लिए अर्ध-सैनिक बलों ने गैर-सरकारी कारकुनों के गिरोह बनाए हुए हैं, जो विभिन्न नामों से काम करते हैं- जैसे तृतीया प्रस्तुति कमेटी (टी.पी.सी.), सश पीपलज मोर्चा (ऐस.पी.ऐम.) झारखण्ड जन मुक्ति परिषद् (जे.जे.ऐम.पी.) और भारतीय लोक मुक्ति फ्रन्ट (पी.ऐल.ऐफ.आई.) आदि। जिन इलाकों में हम गए वहां तृतिया प्रस्तुति एवम् सश पीपलज मोर्चा जयादा सरगर्म हैं। इन हथियारबद्ध गिरोहों के नेता किसी समय माओवादी कम्यूनिस्ट सेन्टर और पीपल्ज वार ग्रुप नामक संगठनों से सम्बन्धित रहे हैं, पर अब वे पुलिस की सेवा कर रहे हैं। पुलिस एवम् अर्ध-सैनिक बलों द्वारा ट्रेनिंग एवम् आधुनिक हथियार ले कर यह 50 से 200 तक की गिनती वाले ग्रुपों में कार्यवाईयां करते है। इनका काम जाने पहचाने माओवादियों के परिवारों और घरों पर एवम् पुलिस अत्याचारों का विरोध करने वाले जनवादी व्यक्तियों पर हमले करना, पुलिस के इशारों पर लोगों को अगवा और कत्ल करना, निर्दोष लोगों को ''दहशतगर्दी’’ और गैर-कानूनी सरगर्मियों के झूठे केसों में उलझाना और बाद में पुलिस से सौदेबाजी करवा कर इन केसों से निकलवाना और इसके बदले में मोटी रकमें वसूलना, व्यापारियों, ठेकेदारों और बड़ी कम्पनियों के अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए राहदारी आदि के रूप में पैसे ऐंठना आदि है। पुलिस अत्याचारों के खिलाफ होने वाले जन-आन्दोलनों के दौरान यह नेताओं एवम् आम लोगों को डरा-धमका कर चुप करवाने के लिए सरगर्म होते हैं। जबरदस्ती लोगों की जमीन-जायदादों पर कब्जा करते हैं। पुलिस इनके खिलाफ कोई शिकायत सुनती ही नहीं। ऐसी कई घटनाएँ लोगों ने हमें बताईं।
धनराई गांव में राष्ट्रीय जनता दल से सम्बन्धित सरपंच कृष्ण देव यादव पर सश पीपलज मोर्चा (एस.पी.एम.) के आदमियों द्वारा दो बार गोली चलाई गई और उसे गम्भीर रूप से जख्मी कर दिया। दोनों बार पुलिस के पास बाकायदा दोषियों का नाम बताकर एफ.आई.आर. दर्ज करवाई गईं, पर कई वर्ष बीत जाने के बावजूद भी पुलिस ने किसी दोषी को नहीं पकड़ा, जब कि वे शरेआम घूम रहे हैं। उल्टा पुलिस ने जख्मी व्यकित के लड़के के विरुद्ध कई केस दर्ज कर लिए और उसे जेल में डाल दिया। एक युवा अथ्यापक दम्पत्ति ने हमें बताया के ऐस.ऐम.पी. के हथियारबद्ध गुन्डे कई बार आधी रात उनके घर जबरदस्ती घुस आते हैं। उनकी मारपीट करते हैं और धमकाते हैं। देवकी देवी नाम की एक महिला ने रोते हुए हमें बताया कि इस गिरोह ने उसके पति विष्णू यादव का कत्ल करवा दिया और जब वह पुलिस के पास दोषियों को सजा दिलाने के लिए केस की पैरवी करने लगी तो इन्होंने पुलिस के साथ मिल कर उसकी 16 वर्षीय लड़की और 30 वर्षीय लड़के को तीन झूठे पुलिस केसों में फंसा कर जेल में डाल दिया। हनें बारचट्टी थाने के इलाके से 25-30 शिकायतें ऐसी मिलीं जिनमें इस गिरोह ने लोगों को कई कई झूठे पुलिस केसों में फंसाया है।
इस तरह पुलिस की छत्रछाया में फल-फूल रहे दूसरे गिरोह तृतीया प्रस्तुति कमेटी (टी.पी.सी.) की सरगर्मियों के बारे में हमें बताया गया। थाना इमामगंज के गांव बाबू राम डेह के निवासी राम देव यादव के घर मार्च 2012 में होली से दो दिन पहले इस गरोह के 100-150 आदमी शाम के साढ़े सात बजे के लगभग आए। मौके के गवाहों के अनुसार उन्होंने पुलिस की वर्दियां पहनी हुईं थीं, काले पटके बांधे हुए थे और आटोमैटिक हथियारों से लैस थे। कुछ एक ने बुलेट प्रूफ जैक्टें भी पहनी हुई थीं। उस दिन रामदेव यादव का सारा परिवार पास के ही एक कस्बे बांकेपुर गया हुआ था। टी.पी.सी. के आदमियों ने बम्ब धमाकों द्वारा उसके घर के 6 कमरे  तहस-नहस कर दिए। इन बम्ब धमाकों द्वारा सामने वाला घर भी टूट गया। इन घरों को गिराने के बाद यह लोग ''टी.पी.सी. जिन्दाबाद’’ और ''माओवादी मुर्दाबाद’’ के नारे लगाते चले गए। इस घर को गिराने का कारण यह है कि रामदेव यादव का एक लड़का विजय यादव माओवादी है। बाद में जब रामदेव यादव के घर का एक कमरा जो आधा ही बना हुआ है, को पूरा बनाने की कोशिश की तो पुलिस ने यह कह कर रोक दिया कि यदि नया कमरा बनवाने देना होता तो पहले बने हुए को क्यों गिराते। टीम के जाने तक यह टूटा हुआ घर वैसे का वैसा पड़ा था। पीडि़त परिवार बाकी बचे दो कमरों में जानवरों के साथ गुजारा कर रहा है।
इसी तरह जून 2012 में थाना टण्डवां के अधीन पड़ते गांव पिछूरीया में रहने वाले विनोद यादव के साथ हुआ। 28 जून 2012 को दोपहर 2 बजे के लगभग सिकन्दर यादव के नेतृत्व में टी.पी.सी. के 100-150 हथियारबद्ध व्यक्तियों ने उसके घर पर हमला बोल दिया। यह घर उसने बैंक से कर्जा लेकर बनाया था। उन्होंने बर्तन और चारपाई तोड़ दिए, 5 कुइंटल चावल और कपड़ों को आग लगा दी। फिर सिकन्दर यादव ने फोर द्वारा हरीहरगंज थाने से जे.सी.बीत मशीन मंगवाई, जिसकी सहायता से घर तहस-नहस कर दिया। अक्तूबर 2012 में जब हम वहां गए तो कमरों की छतें उसी तरह गिरी हुइ थीं और मलबा बिखरा हुआ था। यह कार्यवाई चार घन्टे चली। बाद में सिकन्दर यादव ने पत्रकारों को फोन कर वहां बुलाया और ऐलान किया कि उन्होंने विनोद यादव के भाई प्रमोद यादव को, जो माओवादियों का साथी है, को सजा देने के लिए यह घर गिराया है। पुलिस को जब इस घटना के बारे में सूचना दी गई तो आगे से यह जवाब मिला कि ''जब माओवादी आते हैं, तब बताते नहीं, अब जब टी.पी.सी. वालों ने घर गिरा दिया तो कौन सी आफत आ गई। चाहे थाना वहां से सिर्फ 2 किलोमीटर दूरी पर है, पर पुलिस 24 घन्टे बाद आई और कोई कार्यवाई नहीं की।
जिस दिन हमें पिछूरीया गांव में पड़ताल के लिए जाना था, टी.पी.सी. के नेताओं को इसके बारे में पता चल गया था। वे सुबह जल्दी ही गांव में आ गए और लोगों को जांच टीम के पास न जाने की हिदायतें देने लगे। टीम ने गांव में जाकर उनसे बात करने के लिए तथा विभिन्न घटनाओं पर उनका प्रतिक्रम लेने का अच्छा अवसर समझ कर, कुझ काम बीच में ही छोड़ कर वहां जाने का प्रोग्राम बना लिया और सम्बन्धित सम्पर्कों द्वारा उसके बारे में सूचना भेज दी गई। परन्तु टी.पी.सी. नेताओं को शायद यह बात रास नहीं आई। हमारी टीम के पहुंचने से पहले ही वे गांव से चले गए। उनकी धमकियों के बावजूद भी छोटे से गांव से 150-200 व्यक्ति हमारे पास आए और सारी घटनाओं का विवरण दिया।
7. जहां कहीं भी पुलिस एवम् अर्ध-सैनिक बलों की माओवादियों से सीधी मुठभेड़ होती है और अर्ध-सैनिक बल अपने जान-माल का नुक्सान करवा लेते हैं, तो फिर वे इसका गुस्सा निर्दोष लोगों पर झूठे पुलिस मुकाबले बना कर या आस-पास के गांवों में समाजिक एवम् पारिवारिक समागमों जैसे मृत्यू या शादी-ब्याह आदि के लिए इकट्ठे हुए लोगों पर अत्याचार बरपा कर और उन्हें झूठे पुलिस केसों में फंसा कर निकालते हैं। हमारी टीम 30 अक्तूबर को सुबह भैंसर दोहा टोला गांव से पैदल चल कर, डूमरिया थाने के गांव केंटूआ डिह टोले गई। यहां का एक नौजवान अवदेश भूईया पुत्र श्री शगन भूईया, जो महां-दलित जाति से सम्बन्धित था जालन्धर में लवली-स्वीट वालों की दुकान पर काम करता था। पहली जून को छुट्टी लेकर वह पन्द्रह दिनों के लिए गांव पहुंचा। 10 जून को उसके गांव के नजदीक बल-थर्वा गांव की सीमा में मलुआहा नाम की पहाड़ी के पास सी.आर.पी. की कोबरा बटालियन और स्पैशल टास्क फोर्स के लगभग 200 जवानों ने जिनमें 60 मोटसाईकिलों पर सवार थे, शम्भू प्रसाद सहायक पुलिस कप्तान ओपरेशन गया के नेतृत्व में माओवादियों की एक टोली का सुबह घिराव किया। पुलिस की कहानी के अनुसार माओवादियों ने आस-पास के इलाके में बारूदी सुरंगे बिछाई हुई थीं। कड़े मुकाबले में अर्ध-सैनिक बलों ने ए.के. 47, ए.के.057 एवम् अन्य ऑटोमैटिक राईफलों से 1728 राऊँड गोलियां चलाईं। इस मुकाबले में सी.आर.पी. के दो जवान मारे गए। सहायक पुलिस कप्तान शम्भू प्रसाद का हाथ टूट गया तथा वह बुरी तरह जख्मी हो गया। कई अन्य अधिकारी एवम् जवान भी जख्मी हुए। पुलिस की दो गाडिय़ां और पांच मोटर साईकिल तबाह हो गए। यह मुकाबला लगभग पांच घन्टे चला। कुछ भी हाथ लगता न देख अर्ध-सैनिक बल वहां से वापिस आ गए और आस-पास के गांवों में फैल गए। गांव के लोग 11 बजे तक, जब तक गोलियों की आवाज आती रही अपने घरों में ही रहे, जब गोलियों की आवाज धम गई तो वे घर एवम् खेतीबाड़ी के काम-धन्दों के लिए घरों से बाहर निकल आए। अवदेश भुईया अपने दो और पड़ोसियों फूल चन्द भूईया एवम् समाजित भूईया के साथ, गांव से थोड़ी दूर बहते एक पानी के नाले पर पशूओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए चल पड़ा। जब वे नाले पर पहुँचे तो वहां सी.आर.पी. की टीम पहुँच गई, बिना किसी पुछताछ के इन तीनों को गोलियों से भून डाला। इन्हें एक कैन्टर में डाल कर थाने ले गई। अवदेश और फूल चन्द की तो मौके पर ही मौत हो गई पर समाजित भूईया बच गया। गांव के लोगों और कुछ दलित नेताओं द्वारा मसला उठाने पर बिहार राज्य महां दलित कमीशन ने इस मुकाबले की पड़ताल के बाद इसे बिल्कुल झूठा बताया। कमीशन ने इस मुकाबले से सम्बन्धित मुकद्दमा रद्द करने, अवदेश एवम् फूल चन्द के परिवारों को दस-दस लाख रुपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का आदेश दिया। यह आदेश 13 अगस्त को जारी हुआ था। 30 अक्तूबर तक सरकार ने इस पर अमल करने की बजाय, जिन दलित नेताओं ने मसला कमीशन के पास पहुँचाया था, उनके खिलाफ पुलिस मुकाबले में शामिल होने का झूठा केस जरूर बना दिया गया।
बुजुर्ग महिला के श्रद्धांजलि समागम पर एकत्रित हुए लोगों पर टूटा पुलिस कहर
हम 30 अक्तबूर की रात को बरहा गांव में पहुँचे। घने जंगलों में बसा यह छोटा सा गांव है। यहां पहुंचने के लिए हमारी टीम को फूट-डेढ़ फुट गहरे गड्ढों वाले कच्चे रास्ते द्वारा 15-20 किलोमीटर सफर तय करना पड़ा। यह सफर किसी युवा की भी रीढ़ की हड्डी या पसलियां हिला देने के लिए काफी है। रास्ते में हमने कई छोटे-बड़े नाले भी पार किए। इनमें से कईयों पर पुल बने हुए थे, परन्तु उन्हें मार्ग से जोड़ा नहीं गया था- शायद लोगों को सजा देने के लिए। इस लिए सब को गहरे पानी से  गुजर कर ही जाना पड़ता था। गांव में बिजली नहीं है। इस लिए हमें लालटेनों, मोमबत्तियों और कैमरों की फलैश लाईटों की रौशनी में ही गांव वालों से बातचीत करनी पड़ी। अनुज कुमार पुत्र श्री राजिन्द्र प्रसाद के घर पर उसके परिवार के अतिरिक्त गांव के 70-80 अन्य लोग एकत्रर हो गए थे। उन्होंने हमें अपने दुखों की दास्तां सुनाई।
15 जनवरी 2011 को अनुज कुमार की दादी, जिसकी जनवरी के पहले सप्ताह मृत्यू हो गई थी को श्रद्धांजलि देने हेतू अंतिम रस्मों का कार्यक्रम रखा गया था। इसमें शामिल होने के लिए उसके रिश्तेदार अवम् गांव के बहुत सारे लोग आए हुए थे। बदकिस्मती से उसी दिन सुबह-सुबह वहां से 2-3 किलोमीटर दूर जंगलों में अर्ध-सैनिक बलों का माओवादियों से मुकाबला हो गया। कई घन्टे चली दो तरफा फायरिंग में सी.आर.पी. का एक जवान मारा गया और कुछ जवान जख्मी हो गए, जिसकी वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा।
इस नाकामी का बदला लेने के लिए शाम को 4 बजे के लगभग जब अनुज कुमार के घर श्रद्धांजलि कार्यक्रम चल रहा था तो डी.ऐस.पी. महेन्द्र कुमार बसंत्री एवम् एस.पी. ऑपरेशन्ज अमित लोढा के नेतृत्व में लगभग 500 जवानों ने उसके घर का घिराव कर लिया। सब से पहले वे अनुज कुमार के चाचा राम विलास, बहू प्रीति गुप्ता और छोटी उम्र के पोते पर टूट पड़े। दोनों पुलिस अफसर लातों-घूँसों और डण्डों से उन्हें पीटने लगे और जमीन पर गिरा लिया। उसकी बहू और पोते को भी पीटा। इस दौरान राम विलास के दाँत टूट गए और बाकी शरीर पर भी कई जगह चोटें आईं। प्रीति गुप्ता पर पुलिस ने यह दोष लगाया कि वह माओवादियों के जोनल कमांडर की पत्नी है, हालांकि उसका पति सवर्ण कुमार नजदीकी कस्बे डुमरिया में कई सालों से दुकान चलाता है, और आज तक उस पर कभी भी कोई फौजदारी केस दर्ज नहीं हुआ है। अर्ध-सैनिक बलों की एक टोली उनके घर जबरदस्ती घुस कर सामान की तोड़-फोड़, और लुटमार करने लगी। फिर उन्होंने आए हुए 62 मेहमानों को खड़ा कर लिया और पांच किलोमीटर तक उन सब को लाट्ठियों एवम् लातों-घूँसों से पीटते हुए पैदल ले कर गए। जिन्होंने शोक में सिर मुंड़वाये हुए थे, उन्हें परिवार के नजदीकी समझ कर •यादा पीटा। फिर उन्हें बसों द्वारा पहले इमामगंज और फिर शोर-घाटी धाने ले गए, जहां उन्हें दोबारा पीटा गया। मारपीट की वजह से चोटों की पीड़ा के कारण यह लोग तराह रहे थे। परन्तु पुलिस ने इन्हें कोई डॉक्टरी सहायता नहीं दी। चार दिनों तक इन सब को पुलिस ने नाजायज हिरासत में  रख कर, यातनाएँ देकर 6 व्यक्तियों पर झूठा केस डाल दिया और बाकियों को छोड़ दिया। कुझ दिनों के पश्चात् 3-4 और व्यक्तियों को भी इस केस में उलझा लिया।
तीन निर्दोष दलितों के दर्दनाक कत्लों की गवाह है-
सोनदाहा गांव की धरती
(क) सोनदाहा गांव का 35 वर्षीय दलित नौजवान सुदामा भूईया खेत मजदूरी द्वारा अपनी तपदिक की मरीज पत्नी और पांच बच्चों का पेट पालता था। पिछले साल एक दिन वह फसल की रखवाली करने रात को खेत चला गया। उसे पता नहीं था कि रात को खेतों में अर्ध-सैनिक बलों के आदमखोर दरिन्दे दनदनाते घूम रहे हैं। उसी दिन सी.आर.पी. ने उनके गांव में आ कर कैम्प लगाया था। इसकी एक गश्ती टीम ने आधी रात को बिना किसी कारण उसे गोलियों से भून डाला। कुछ गोलियां उसके पेट में लगीं, उसकी अंतडिय़ां बाहर आ गई थीं। हालांकि वह मौके पर ही मारा गया था, परन्तु पुलिस ने सुबह जल्दी ही उसके भाई सुरेश भूईया को जगाया और कहा कि सुदामा भूईया ने उन पर गोलियां चलाईं थीं। जवाबी गोलीबारी में वह जख्मी हो गया और कहीं भाग गया, उसे ढूँडो। जब वह गांव के लोगों को लेकर खेत में गया तो वहां सुदामा की लाश पड़ी हुई थी।
यह घटना 13 फरवरी 2011 की रात को हुई। सुदामा के दो और छोटे भाई योगेश एवम् जोगिन्द्र भूईया गांव के कुछ अन्य व्यक्तियों को लेकर सुदामा की लाश को चारपाई पर लेटा कर पोस्टमार्टम करवाने के लिए शहर के सिविल अस्पताल की तरफ चल पड़े। रास्ते में धनेड़ा गांव के नजदीक उन्हें कोबरा बटालियन का एक दस्ता मिल गया, जिन्होंने धमकी दी कि इस मामले का जिक्र भी किसी के पास नहीं करना और चुपचाप लाश वापिस गांव ले जा कर इसका अंतिम संस्कार कर दो, नहीं तो पुलिस से मुकाबला करने का केस बना देंगे। डी.ऐस.पी. महेन्द्र कुमार बसंत्री इस टोली का नेतृत्व कर रहा था। डर के मारे परिवार ने बिना किसी पोस्टमार्टम या ऐफ.आई.आर. के लाश का रात 8 बजे अंतिम संस्कार कर दिया। गांव के लोगों के बताने के मुताबिक सुदामा भूईया एक शरीफ खेत-मजदूर था, जिसने कभी किसी गैर-कानूनी सरगर्मी में हिस्सा नहीं लिया था। पी.यू.सी.ऐल. की गया जिला इकाई ने इस घटना के बारे में समाचार पत्रों में छपी रिर्पोटों से जानकारी हासिल करके, इसकी बाकायदा छानबीन की और पूरे तथ्यों सहित उच्च अदिकारियों एवम् राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन को रिर्पोट भेजी। बहुत दबाव पडऩे पर बांके बाजार थाने में इस कत्ल के बारे में मुकद्दमा नं. 54, घटना से 5 महीने बाद दिनांक 14/02/2011 को दर्ज कर लिया गया, परन्तु आज तक इस पर कोई कार्यवाई नहीं हुई।
(ख) इसी गांव के चप्परवाहा समुदाय की महिला शीला देवी पत्नी कारू सिंह भुक्ता ने बताया कि वह दलित जाति से सम्बन्ध रखती है। उसका परिवार जंगल में से पत्ते तोड़ कर पत्तल बनाने का काम करता है। उसका पत् कारू सिंह भुक्ता अपने एक पड़ोसी देव नन्दन सिंह तथा आठ महिलाओं के साथ जंगल में पत्ते तोडऩे गया था। रास्ते में उन सब को सी.आर.पी. की एक गश्ती टोली ने पकड़ लिया। जंगल में कुछ दूर तक सी.आर.पी. उन्हें आगे लगा कर पीछे-पीछे चलती रही। फिर उन्होंने अचानक गोली चला कर कारू सिंह भुक्ता को मार डाला। बाद में पुलिस उसकी लाश और बाकी अन्य 9 लोगों को पकड़ कर थाने ले गई। तीन दिन बाद परिवार को उसकी लाश दी। लाश देते समय पुलिस ने धमकी दी कि लाश को ले जाकर फौरन अंतिम संस्कार न किया तो उसके साथी पकड़ी आठ महिलाओं पर केस बना कर जेल में बन्द कर देंगे। पुलिस ने इस केस में एफ.आई.आर. दर्ज की है, परन्तु किसी दोषी के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की।
(ग) इसी गांव का महां दलित बुजुर्ग साधू भूईया अपने पोते सुनन्दन भुईया के साथ खेत में काम कर रहा था। पुलिस गश्त करती आई और सुनन्दन भूईया से गांव में आतंकवादियों के आने के बारे में पूछताछ करने लगी। जब उसने कोई जानकारी न दोने की बात कही तो पुलिस ने उसे पीटना शुरू कर दिया। यह देख कर साधू भूईया अपने पोते को बचाने के लिए भाग कर आया। पुलिस वाले उस पर टूट पड़े और लाट्ठियों से पीटते हुए उसे जमीन पर गिरा दिया। जब वह धरती पर गिरा दर्द से कराह रहा था तो दो सी.आर.पी. के जवान उसके पेट पर चढ़ कर जोर जोर से उछलने लगे। फलस्वरूप उसका पेट फट गया और अंतडिय़ां बाहर निकल आईं। यह दरिन्दगी भरा काम करने के बाद पुलिस वहां से चली गई। सुनन्दन उसे रेढ़ी पर लेटा कर घर ले आया। तीन दिन बाद उसकी मौत हो गई। पुलिस ने गांव के मुखिया द्वारा धमकी भेज कर उसका अंतिम संस्कार करवा दिया। गरीब खेत मजदूर के इस निर्दयी कत्ल की खबर गांव की सीमा में ही दम तोड़ गई।
थानों में बर्बरता से मारा जाता है गरीब लोगों को
(क) तथ्य खोज टीम पहले दिन डालटनगंज से चलकर हरीहर गंज कस्बे के एक स्कूल में पहुँची, जहाँ 50-60 लोग जिनमें 5-7 औरतें भी थीं, उसका इन्तजार कर रहे थे। हमने लोगों को अपने आने का मकसद बताया तथा उनको पुलिस, माओवादियों या और किसी हथियारबद्ध ग्रुप द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में जानकारी देने के लिए कहा। कुलियाहा गांव के लालेन्दर यादव पुत्र भूरे यादव ने अपने भाई मदन यादव की पुलिस अत्याचार से हुई मौत के सम्बन्ध में रौंगटे खड़े कर देने वाली जानकारी दी। मदन यादव 6 जून 2012 को अपने ससुराल सिमराह, थाना डूमरिया जिला गया में गया। अढाई बजे के करीब सिविल कपड़ों में पुलिस ने लुंगी फाड़कर उसके साथ उसके हाथ-पैर भांध दिए तथा डंडों के साथ पीटना शुरू कर दिया। जब उसकी पत्नी ने उसे बचाना चाहा तो पुलिस वालों ने उसे धक्के मारकर नीचे गिरा दिया। मदन यादव पुलिस हिरासत में है, परन्तु ये नहीं बताया कि वह कौन से धाने में बन्द है या किस दोष में पकड़ा है। अगले दिन उसकी थारूल थाने में बन्द होने की सूचना मिलने पर वो सारे वहां पहुँच गए। जब वे थाने के गेट के अन्दर जाने लगे तो पुलिस ने उनको रोक दिया तथा थाने के बाहर बैठने का आदेश सुनाया। उस समय थाने में ऐस.पी. डा. सिद्धार्ध मोहन जैन, सहायक पुलिस कप्तान ऑपरेशन्ज अरुन कुमार डी.ऐप.पी. संजय कुमार तथा थाना प्रमुख अरुन कुमार उपस्थित थे। इन सबकी उपस्थिति में पुलिस ने मदन यादव को हवालात से बाहर निकाल कर उस पर अंधाधुन्द अत्याचार किया। उसे एक पेड़ पर उल्टा लटकाकर पीटा। जब वो बेहोश हो गया तो उसे पेड़ से उतारकर थाने के पिछवाड़े के एक कमरे में उठाकर ले गए। उसके वारिसों ने फिर थाने में जाने का प्रयत्न किया, परन्तु पुलिस ने धमकाकर भगा दिया। दोपहर के बाद पत्रकारों ने उनको मदन यादव की पुलिस के अन्धे अत्याचार के कारण हुई मौत की सूचना दी। परन्तु पुलिस ने उन्हें थाने के भीतर जाने नहीं दिया। आखिर शाम के सात बजे पुलिस ने उसके एक रिश्तेदार को बुलाकर मौत हो जाने के बारे बताया तथा पोस्ट-मार्टम के बाद लाश उनके हवाले करने के बारे में कहा।
पुलिस ने इस घटना सम्बन्धी ऐफ.आई.आर. नं. 90 7/6/2012 के अधीन धारा 302 दर्ज की है। अन्दर ही अन्दर चाहे पुलिस मदन यादव को माओवादियों का एरीया कमांडर बताती है, परन्तु इस बात का कोई सबूत नहीं है। आज तक उसके विरूद्ध किसी मुजरिमाना कार्यवाई का कोई पुलिस रिकार्ड या अखबारी बयान आदि नहीं है। मदन यादव के कत्ल की घटना पर मुख्य मंत्री नितिश कुमार ने अफसोस प्रकट किया था तथा उसकी जाँच मजिस्ट्रेट से करवाने का भी आदेश दिया था। परन्तु आज तक इस जाँच की रिपोर्ट प्रकट नहीं की हई। थानेदार अब्दुल कादिर तथा बालकरन मोची, इस कत्ल के लिए जिम्मेदार होने के दोषों तहित कुछ समय के लिए बर्खास्त किए गए थे, जिन्हें बाद में बहाल कर दिया गया। मदन यादव पर पुलिस हिरासत में अत्याचार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई कार्यवाई नहीं की गई।
(ख) झारखण्ड के पलामू जिले का सदर-मुकाम डालटनगंज एक अंग्रेज मानव-विज्ञानी कर्नल ऐडवर्ड टी. डाल्टन ने, जो 1861 में छोटा नागपुर इलाके का जिला कमिश्नर था, उत्तरी कोयल नदी के किनारे बसाया था। अंग्रेज चले गए, परन्तु उनकी जगह गद्दियों पर बैठ भारतीय शासकों ने राजसत्ता का अत्याचारी तथा लुटेरा चरित्र बदला नहीं। विकास दे नाम पर यहां के प्राकृतिक माल खजानों की लूट और तेज हो गई। लोगों पर उजाड़े तथा अत्याचार की आरी और अधिक तेजी से चलने लगी। वातावरण तथा मानव अधिकारों सम्बन्धी भारतीय लोगों के कमिशन द्वारा एकत्रित किए गए आँकड़ों के अनुसार अब तक 65 लाख 40 हजार लोक झारखण्ड में भिन्न-भिन्न विकास प्रोजैक्टों के लिए बर्बाद किए जा चुके हैं। भले ही आदिवासियों की जमीन से बेदखली रोकने के लिए कानून बना है, परन्तु अब तक लगभग 23 लाख एकड़ जमीन आदिवासियों के हाथों से छिन चुकी है। झारखण्ड सरकार ने अनेकों देसी तथा विदेशी कमपनियों के साथ जो 107 समझौते किए हैं, यदि वे सभी लागू हो गए तो 2 लाख एकड़ जमीन आदिवासियों के हाथों से निकलकर कम्पनियों के स्वामिम्तव अधीन आ जाएगी तथा 10 लाख लोग उजड़ जाऐंगे।  लोगों पर अत्याचार को बयान करती तस्वीरें ये आंकड़े पेश करती है: झारखण्ड में पोटा अधीन 654 केस दर्ज हुए, जिनमें 3200 लोगों को दोषी बताया गया। पुलिस ने 10 बच्चों तथा 202 लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया। झारखण्ड का अलग राज्य बनने के लेकर साल 2011 तक 550 लोगों को पुलिस ने मुकाबलों में मार डाला तथा 4372 लोगों को नक्सली कहकर  गिरफ्तार किया। राज्य में पुलिस फायरिंग की 346 घटनाएँ हुईं, जिनमें 56 लोग मारे गए तथा 34 जख्मी हुए। पुलिस हिरासत में 35 लोग तथा न्यायिक हिरासत (जेलों) में 541 लोगों की मौत हुई। सारंडा के जंगलों में माओवादियों के विरुद्ध चलाए 'ऑपरेशन मानसून तथा 'ऑपरेशन एनाकौंडा दौरान सुरक्षा बलों के हाथों तीन आदिवासी मारे गए, औरतों के साथ बलात्कार किए गए तथा लगभग 500 आदिवासियों को अत्याचार का शिकार बनाया गया। नक्सली संगठनों तथा अर्ध-सैनिक बलों के बीच हुई 4430 हिंसक झड़पों में कुल 1878 लोगों को जान से हाथ धोने पड़े, जिनमें 399 पुलिस तथा अर्ध-सैनिक बलों के जवान थे। इस समय माओवाद के साथ निपटने के नामाधीन राज्य में 70 हजार से अधिक अर्ध-सैनिक बल तायनात हैं, जिन्होंने ग्रमीण क्षेत्र में लोगों के नाक में दम कर रखा है। रोजगार न के बराबर है, इसलिए यहाँ से हर साल सवा लाख लोग स्थानांतरण कर जाते हैं। इनमें 76 प्रतिशत आदिवासी होतें है तथा लगभग 33 हजार लड़कियां। गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 12 सालों में झारखण्ड में से लगभग 30 लाख लोग बेरोजगारी की मार झेलते हुए रोजगार की खोज में बाहर चले गए हैं, जिनमें लगभग 5 लाख औरतें है,जो महां नगरों में जाकर अमीर घरों में बर्तन साफ करने तथा झाडू-पोचा लगाने का काम करती हैं।
(ग) झारखण्ड के बाकी जिलों की भांति डालटनगंज की पुलिस भी लोगों पर अत्याचार करने में किसी से कम नहीं। पहली जनवरी 2010 को यहां की पुलिस ने राजिन्दर यादव नाम के एक किसान को घर से उठा लिया। पहले पुलिस ने उसे थाने में पीटा, फिर उसे ऐस.पी. जतिन नारवाल- जो हरियाणे में जन्मा है, की कोठी में ले गई। वहां उसे बर्बरता से पीटा गया। छत वाले पंखे की हुक से उल्टा लटकाकर भी पीटा गया। इस बेतहाशा जुलम से उसकी मौत हो गई। जतिन नारवाल ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए लाश उठाकर थाने भेज दी। इस दौरान ये खबर लोकतांत्रिक अधिकारों के संगठनों तथा जनतक संगठनों के कारकुनों तक पहुँच गई तथा लोग थाने के सामने एकत्रित होने शुरू हो गए। बात को बि$गते देख एस.पी. ने मृतक परिवार के लिए मुआवजा तथा नौकरी देने का दाना डाला। सिविल सर्जन ने मृतक की लाश का पोस्ट-मार्टम लोगों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में करने का वादा किया। परन्तु बाद में उच्चाधिकारियों के दबाव में आकर चोरी छिपे ही पोस्टमार्टम करवा दिया तथा लिख दिया कि मृतक के शरीर पर बाहरी जख्म या मारपीट का कोई निशान नहीं था। इस बात पर लोगों ने गुस्सा और बढ गया तथा उन्होंने रोष-प्रदर्शन शुरू कर दिया। पुलिस ने मामला ठण्डा करने के लिए मुआवजे तथा नौकरी के साथ साथ इन्दिरा आवास योजना अनुसार मृतक के परिवार को घर बनाकर देने की भी पेशकश की। परन्तु लोग लाश का रांची के मैडीकल कालेज में दोबारा पोस्टमार्टम करवाने तथा दोषियों के विरुद्ध केस दर्ज किये जाने की मांग पर डटे रहे। कड़ाके की ठण्ड में भी वो थाने के सामने धरना लगाकर डटे रहे। पुलिस ने दो-तीन बार लाठीचार्ज द्वारा लोगों को बिखेरने की कोशिश की, परन्तु नाकाम रही। आखिर पुलिस को झुकना पड़ा तथा दोबारा पोस्टमार्टम तथा लाश की वीडियोग्राफी में मृतक के शरीर पर पुलिस के अत्याचारों के कारण आईं सभी चोटें रिकार्ड हो गईं। पुलिस को थकहारकर इस मामले में एफ.आई.आर दर्ज करनी पड़ी। दोबारा हुए पोस्ट मार्टम में राजिन्द्र यादव के शरीर पर 12 चोटों के निशान दर्ज किए गए। झारखण्ड सरकार ने इस मामले की छानबीन के लिए दो उच्च अधिकारियों की कमेटी बनाई, जिसकी सिफारिश पर डालटनगंज के सिविल अस्पताल के उन तीनों डाक्टरों को चार्जशीट किया गया, जिन्होंने झूठी पोस्टमार्टम रिपोर्ट दी थी। इस कमेटी ने ऐस.पी. जतिन नारवाल को अपनी ड्यूटी में कोताही बरतने का दोषी पाया। मुकद्दमा दर्ज होने के बावजूद अभी तक दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ योग्य कार्यवाई नहीं की गई।
(घ) राजिन्द्र यादव के पुलिस हिरासत में कत्ल तथा केंटुआ डिह गांव में पुलिस द्वारा झूठे मुकाबले में दो महा दलित नौजवानों को मार डालने की घटनाओं की सरकारी जाँच एजंसियों द्वारा की गईं छानबीन में पुलिस तथा अर्ध-सैनिक बलों को दोषी ठहराया गया है। परन्तु दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाई करने तथा पीडि़त परिवारों के लिए मुआवजा, रोजगार तथा पुनरजीविका का प्रबन्ध करने की बजाए पुलिस ने इन कत्लों के विरुद्ध जनतक लामबंदी करके पुलिस को कटधरे में खड़ा करने वाले डालटनगंज पी.यू.सी.ऐल. के कारकुन संतोष यादव तथा दलित नेता रोशन मांझी पर पुलिस पर हमला करने के झूठे केस जरूर दर्ज कर लिए हैं।
(8) इस क्षेत्र में सरकारी 'विकास भी नहीं किया गया है। सड़कें, बिजली, पीने योग्य पानी, अस्पताल-डिस्पैन्सरी आदि कुछ भी नहीं हैं। ऊबड़-खाबड़, गड्ढों से भरपूर रास्ते होने के कारण, किसी बिमार या जख्मी व्यक्ति या गर्भवती औरत को गांव से शहर/कस्बे में इलाज के लिए लेकर आना संभव नहीं। जन-वितरण प्रणाली का मानोनिशान नहीं। कुछ गैर-सरकारी तथा सामाजिक संगठनों ने जब मनरेगा, स्कूली बच्चों के लिए दोपहर का खाना, विधावाओं, बूढों तथा अपंग व्यक्तियों आदि के लिए पेन्शन तथा इस क्षेत्र के विकास के मामले उठाये तो पुलिस ने उनपर माओवादी होने का ठप्पा लगाकर झूठे केसों में फंसा दिया? अब इनमें से बहुत सारे या तो जोलों में बन्द हैं, या पुलिस के डर से छिपे फिरते हैं। ग्रामीण रास्तों पर सफर करते हुए हम बहुत सारे नालों के ऊपर से गुजरे जिनपर पुल बने हुए थे, परन्तु उनको रास्तों से जोड़ा नहीं गया था, जिस कारण मजबूरन गहरे पानी में से गुजरना पड़ता था। बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार के सभी दावों के विपरीत सड़कों का बुरा हाल है। राष्ट्रीय शाहमार्ग नं. 2 तथा 75 इस कदर टूटे-फूटे तथा गड्ढों से भरे हुए हैं कि 10-15 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक रफ्तार पर गाड़ी चलाना संभव नहीं। विद्या तथा स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। शासक पार्टी जनता दल (यूनाईटिड) के नेता खुलेआम कह रहे हैं कि इस क्षेत्र में कोई विकास नहीं किया जा सकता। वास्तव में सरकार, लोगों को सभी मूलभूत सुविधाएँ- सड़कें, बिजली, स्कूल, अस्पताल, राशन डिपो तथा कल्याणकारी योजनाओं से वंचित करके उन्हें सामूहिक सजा दे रही है।
 -ऐन.के. जीत





"सुर्ख रेखा" कम्यूनिस्ट क्रांतिकारी पब्लिकेशन है, जो लोगों को सामाजिक क्रांति की जरूरत एवं महत्व के बारे में जागृत करने के लिए सक्रिय है। "सुर्ख रेखा" इस पब्लिकेशन की तरफ से पंजाबी में निकाली जाने वाली दो मासिक पात्रिका है। इस पैम्फलिट दिया गया लेख सुर्ख रेखा के जनवरी-फरवरी 2013 अंक में से अनुवादित है।

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