Thursday, January 31, 2013

''पैसे पेड़ों को लगते हैं” परन्तु बड़ी जोकों को देने के लिए


''पैसे पेड़ों को लगते हैं
परन्तु बड़ी जोकों को देने के लिए
21 सितम्बर को भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में कहा था कि कोई भी सरकार गरीबों पर बोझ नहीं डालना चाहती ''परन्तु पैसे पेड़ों को नहीं लगते उसने कहा कि सबसिडियों पर होते खर्च क्षमता से बाहर हैं ''कीए ही नहीं जा सकते
परन्तु अगले ही दिन सरकार ने जो कदम उठाया इस से लगने लगा है कि पैसे पेड़ों पर लगते हैं सरकार की वित्तीय क्षमता की भी कोई सीमा नहीं है
सरकार ने ऐलान किया कि बिजली बोर्ड के निजीकर्ण निगमीकर्ण के बाद बनी बिजली वितरण कंपनियों को पांव पे खड़े होने के लिए पुन: संगठित करने के लिए एक लाख नबे ार करोड़ रुपए खर्च करेगी 24 सितम्बर को आर्थिक मामलों की कैबनिट कमेटी ने यह फैसला कर दिया
यह कदम लोगों बिजली दूरों के साथ जोकों के हितों के लिए रचे गए ढोंग का पर्दाफाश करता है सरकार कहती रही है कि बिजली बोर्ड की हालत पस्त है यह पांव पे खड़ा नहीं हो सकता लोगों को सेवाएं नहीं दे सकता सरकार इस की सहायता का बोझ नहीं उठा सकती निजीकर्णरूरी है ताकि देसी-विदेशी पूंजीपतियों से पूंजी हासिल हो सके लोगों को सेवाएं मिल सकें
इस बहाने लम्बी अवधी में लोगों के खून-पसीने की कमाई से उसारे गए बिजली बोर्डों के ढांचे तोड़ दिए गए मुफ्त के मोल बड़ी प्राईवेट जोकों के सुपुर्द कर दिए गए दूरों-मुलाजमों के हित रौंद दिए गए परन्तु बिजली सेवा में कोई सुधार हुआ बिजली दरों में बार बार बढौत्री का सिलसिला शुरू हो गया
परन्तु अब सरकार बिजली वितरण कंपनियों की पस्त हालत की बातें करने लगी है उनकी आर्थिक मुक्ति के नाम पर लाखों करोड़ रुपए, इनको भेंट करने का फैसला कर रही है यह लोगों के हितों से खिलवाड़ है, मक्कारी है, धोखा है, बेईमानी है सरकारें बड़ी जोकों की दलाल हैं लोगों की दुश्मन हैं राज-भाग बड़ी जोकों का है बिजली का निजीकर्ण, निगमीकर्ण इस लिए डन्डे के जोर से किया गया है
इस लिए, जोंकों के राज के खिलाफ संगठित जन-शक्ति का डन्डा तगड़ा करने कीरूरत है जब तक यूं नहीं होता, लोगों के घरों की रौशनी छीनी जाती रहेगी रोगार उजड़ता रहेगा

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