बैंक कानूनों में संशोधन:
अन्धे मुनाफों के लिए रास्ता और आसान
18 दिसम्बर को लोक सभा में बैंक कानून संशोधन बिल पास कर दिया गया है। किसी समय शासक दावा किया करते थे कि बैंक किसानों एवम् अन्य गरीब लोगों को शाहूकारों की लूट से बचाने के लिए खोले गए हैं। जब इन्दिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का कदम उठा कर खूब प्रशंसा बटोरी और प्रगतिशील एवम् समाजवादी होने का नकली सेहरा माथे पर सजाया तो उस समय और जोर से दावा किया गया कि अब तो बैंक लोगों को खुशहाल कर देंगे। पर समय असलियत को सामने ले आया। बैंक किस्तें किसानों के गले का फन्दा बन गईं। नोटिस एवम् वरन्ट जारी होने लगे। कुर्कियों के सिलसिले चलने तक की नौबत आ गई। लाखों में हुईं किसानों की आत्महत्याओं से देश भर में हाहाकार मच उठी। बैंक एवम् शाहूकार कूटनीतियां चला कर किसानों की जमीनें हड़पने लगे। बड़े बड़े जमींदार सूदखोरी के धन्दे में हाथ रंगने लगे और लैन्ड सीलिन्ग जैसे दिखावे के कानूनों के बावजूद बड़े भूमिपतियों की तादात फैलने लगी।
आज जब करज के अंबारों ने किसानी की दुर्दशा की हुई है और जनता कर्जा कानूनों में जन-हितैषी तबदीलियों की मांग कर रही है तो संसद में पास हुआ संशोधन बिल, लोगों की इन उमंगों के बिल्कुल विपरीत साबित हुआ है। यह सच्चाई आत्महत्याओं और कुर्कियों की मार झेल रहे लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने वाली है कि बड़ी-बड़ी कार्पोरेशनों द्वारा बैंकों के दबाए हुए दो लाख पच्चीस करोड़ के कर्ज संसद में विचारचर्चा का विषय तक नहीं बने। इन बकायों को वसूल करने की गारन्टी करने के लिए कानूनों में कोई संशोधन तो क्या करना था वित्तमंत्री ने शरेआम ही कह दिया कि ''यह वसूल न किए गए ऋ णों के मामलों पर सख्ती से पेश आने का समय नहीं है। यह उद्योग की सहायता करने का समय है।” बड़ी जोंको से मित्रता और लोगों से दुश्मनी का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है?
संसद में पास किए गए बिल ने तीन कानूनों में जन-विरोधी संशोधन किए हैं। इसने भारतीय रिजर्व बैंक की शक्तियां बढ़ा दी हैं। निवेशकों की वोट-ताकत बढ़ा दी है और सरकारी बैंकों को बोनस अधिकार जारी करके पूंजी इकट्ठा करने की छूट दे दी है। सरकारी बैंकों में प्राइवेट निवेशकों की वोट-ताकत में की गई वृद्धि कार्पोरेशनों को बैंकों की रकमों का मनमर्जी से लाभ प्राप्त करने का मौका देगी। इन संशोधनों द्वारा नए प्राइवेट बैंक खोलने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा लाईसेन्स जारी करने का रास्ता आसान कर दिया है। प्राइवेट बैंकों का यह प्रसार, साथ में सरकारी बैंकों की गिनती में कमी का फैसला और दूसरी तरफ सरकारी बैंकों मे निजी निवेशकारों की वोट-ताकत में वृद्धि, यह सभी कदम मिल कर इस बात की गारन्टी करेंगे कि बैंकों की पूंजी खेतीबाड़ी, छोटे उद्योग अथवा गरीब लोगों की जरूरतों पर न लगे, बल्कि ज्यादा से ज्यादा बड़ी जोंकों के मुनाफे बढ़ाने के काम आए। नई छूटें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बैंक खोलने की आज्ञा देती हैं। इस प्रकार बैंक एवम् उद्योग की पूंजी के घुल-मिल कर चलने की और मनमर्जियां करने की हालत बनेगी।
सरकारी बैंकों को संयुक्त करके इनकी गिनती कम करने का कदम भी देखने में चाहे सरकारी एकाधिकार को ताकतवर बनाने का कदम लगता है परन्तु सरकारी बैंकों में प्राइवेट कंपनियों को पूंजी लगाने की खुली छूट देना धीरे धीरे बैंक प्रणाली पर उनके द्वारा सीधे रूप में हावी हो जाने की गारन्टी करेगा।
लोगों की तीखी प्रतिक्रिया की वजह से सरकार ने दो बड़े जन-शत्रु कदमों को फिलहाल रोक लिया है। इसने बैंकों में विदेशी पूंजी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ा कर 49 प्रतिशत करने का संशोधन वापिस ले लिया है और बैंकों को जिन्स वायदा व्यापार को छूट देने का संशोधन भी फिलहाल एक तरफ रख लिया है। पर इसने सरकार की नीयत के बारें में कोई 'भ्रम नहीं’ रहने दिया। जिन्स वायदा व्यापार के बारे में फिलहाल अलग रखा गया संशोधन, आगामी सौदों के बारे में रैगूलेशन एक्ट संशोधन बिल में घुसेड़ दिया गया है, जो 2013 में संसद में पेश किया जा रहा है।
लोगों के हित मांग करते हैं कि बैंकों की सुविधाओं का सस्ती दरों पर उन 40 करोड़ लोगों तक प्रसार किया जाए, जिनकी बैंकों तक पहुँच ही नहीं है। इसके अतिरिक्त छोटे किसानों और उत्पादकों के लिए सस्ती ऋ ण सुविधाओं में वृद्धि करने की जरूरत है। परन्तु सरकार बिल्कुल उल्टा रास्ता अपना रही है। आगामी जिन्स व्यापार या जिन्स वायदा व्यापार का भारी फायदा विदेशी बैंकों एवम् बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होना है। किसानों के पल्ले तो इसमें से कुछ भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत के किसानों का बिल्कुल ही मामूली हिस्सा (0.1 प्रतिशत) ही वायदा व्यापार में शामिल है। असल में यह किसान तो हैं ही नहीं। बहुत बड़े भूमि-मालिक हैं।
ऐसे हमलों के खिलाफ संघर्ष तेज करना लोगों की बड़ी जरूरत है।
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