चीनी के कंट्रोल मुक्ति का मसला
बड़ी जोकों को मीठा संकेत
केन्द्र सरकार द्वारा बनाई रंगराजन कमेटी ने चीनी को कंट्रोल मुक्ति करने की सिफारश करके चीनी क्षेत्र के बड़े कार्पोरेट शहनशाहों को मीठा संकेत दिया है। ''चीनी से कंट्रोल हटाने” के शब्द ही भ्रम डालने वाले हैं। क्योंकि चीनी पहले ही सरकारी कंट्रोल के अधीन नहीं है। सरकार यह कीमतें निर्धात नहीं करती। परिणामस्वरूप चीनी दिन-प्रति दिन गरीबों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। ''कड़वी” होती जा रही है। क्योंकि निर्बल सी जन वित्रण प्रणाली चीनी को सरपट दौड़ रही कीमतों के खिलाफ प्रभावशाली ढाल बनने योग्य नहीं है।
तो भी चीनी क्षेत्र में सीमत कंट्रोल इस पक्ष से है कि अभी सरकार यह निर्धात करती है कि चीनी का कितना कोटा खुली मंडी में वेचा जाएगा। और कितना हिस्सा राशन की दुकानों द्वारा सपलाई किया जाएगा। चीनी मिल्लों को अपनी उत्पादन का दस प्रतिशत हिस्सा बाजार की कीमतों से कम कीमतों पर बेचना पड़ता है। जिसे सरकार जनतक वितर्ण प्रणाली द्वारा गरीबों को सपलाई करती है। (वास्तव में यह किस हद तक होता है, यह एक अल्ग विश्य है।
परन्तु अब रंगाराजन कमेटी के पैनल ने सिफारिश की है कि उद्योग को सरकार की कल्यानकारी सकीमों के 'बोझ’ से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाए। सरकार चीनी की बाजार से सीधी खरीद करे व सबसिडी पर वेचे। ता कि चीनी मिलों के मुनाफों पे कोई आंच ना आए।
कमेटी ने दावा किया है कि एसा करने से चीनी की घरोगी (अंदरूनी) कीमतों पे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब कि आसमान छू रही चीनी की कीमतें पहले ही इस दावे को रद्द कर चुकी हैं। लैवी चीनी से चीनी मिलों की मुक्ति की इस सिफारिश को चीनी क्षेत्र की निरोल मुक्ति के पक्ष में बड़ी सिफारिश माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि अन्य क्षेत्रों में देसी विदेशी पूंजीपतियों के लिए आजादी की वजह से जो माहौल बना हुआ था, वह चीनी क्षेत्र को हासिल नहीं था। इसी कारण निवेशक झिजकते थे।
चीनी उद्योग के प्रतिनिधियों ने एक बयान के द्वारा इस प्रसताव पर खुशी से छलांगे लगाई हैं। उन्होंने कहा है कि चीनी के क्षेत्र में पूंजी लगाने का अब मजा आएगा। अब मुनाफों में उछाला मिलेगा।
परन्तु गरीब लोगों के लिए यह बड़ी जोकों के राज्य द्वारा उनके गले पे अंगूठा रखने का एक और कदम है।
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